
क्या आपने कभी सोचा है कि जिस योजना को किसानों की तकदीर बदलने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर बनाया गया हो, वह 13 वर्षों तक धूल क्यों फांक रही है?
सिल्ली प्रखंड के सुंडील गांव की तस्वीर कुछ यही बयां कर रही है। वर्ष 2013 में झारखंड सरकार के सहकारिता विभाग ने ‘कोंचो लैम्प्स लिमिटेड’ (LAMPS) का निर्माण करवाया था।
उद्देश्य था—
किसानों को उनके अनाज का उचित मूल्य दिलाना, खाद-बीज मुहैया कराना और उन्हें दलालों के चंगुल से बचाना। लेकिन आज 13 साल बाद भी स्थिति यह है कि इस इमारत के दरवाजे पर लगा ताला जंग खा रहा है।[प्रमुख बिंदु: किसानों का दर्द]सुविधाओं का अभाव: क्षेत्र के हजारों किसान आज भी बीज, खाद और धान बिक्री के लिए 6-7 किलोमीटर दूर जाने को मजबूर हैं।सरकारी धन की बर्बादी: करोड़ों की लागत से बनी इमारत रखरखाव के अभाव में जर्जर होती जा रही है।
अपेक्षा और हकीकत:
सरकार ‘सहकारिता को मजबूत करने’ के दावे तो करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इन तालों में बंद पड़ी है।
[अधिकारियों का रुख]
इस मुद्दे पर जब हमने प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) अनिल कुमार से बात की, तो उन्होंने जांच और कार्रवाई का आश्वासन दिया है। वहीं, दूसरी ओर लैम्प्स के प्रबंधक का फोन ‘स्विच ऑफ’ मिलना, कहीं न कहीं इस पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।[निष्कर्ष और मांग]सवाल यह नहीं कि लैम्प्स क्यों नहीं खुला? सवाल यह है कि 13 साल तक चली इस लापरवाही का जिम्मेदार कौन है? क्या किसानों का समय, मेहनत और सरकारी पैसा इसी तरह बर्बाद होता रहेगा?ग्रामीणों की मांग स्पष्ट है: लैम्प्स का ताला तुरंत खुले और किसानों को उनका अधिकार मिले।क्या आप भी मानते हैं कि जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।
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